सरल, सहज व बिना लॉग लपेट के व्यक्त व्यंग्य विचार
बतरस (व्यंग्य संकलन)
लेखक - राजेश विक्रांत
समीक्षक - डा. राजेश्वर उनियाल
हालांकि व्यंग्य लेख तो हमें यदाकदा पढने को मिल ही जाते हैं, परंतु व्यंग्य संकलन या व्यंग्य विधा की पुस्तकें बहुत कम उपलब्ध हो पाती हैं । इसी क्रम में जब मुझे श्री राजेश विक्रांत जी का व्यंग्य संकलन बतरस पढने को मिला तो मैंने समय निकालकर उसे पढा और पढता चला गया । सरल, सहज व बिना लाग-लपेट के व्यक्त व्यंग्य विचारों को अगर पढ़ना हो तो मैं कहूंगा कि श्री राजेश विक्रांत जी की पुस्तक एक श्रेष्ठ व्यंग्य कृति है । इस हेतु उन्हें साधुवाद ।
व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसमें लेखक प्रतीकात्मक ढंग से महत्वपूर्ण बातें कह जाता है । व्यंग्य गंभीर होने के साथ-साथ चोटिल होता है और चोटिल होने के लिए व्यंग्य को धारदार होना चाहिए । लेकिन स्वभाव से सीधे व सरल श्री विक्रांत प्रतीकात्मक के बजाए वर्णनात्मक पर अधिक ध्यान देते हैं तथा उनको जो कहना होता है वह सीधे-सीधे कह देते हैं ।
दूसरी बात यह है कि प्रत्येक व्यंग्यकार की अपनी एक विशिष्ट शैली होती है । वह अपनी शैली विकसित करता है और उसी शैली में व्यंग्य रचता है । इससे एक तो साहित्य भी समृद्ध होता है और साथ ही रचनाकार की भी एक छाप बनती है । आशा है कि श्री राजेश विक्रांत जी भी अपनी भावी रचनाओं में अपनी व्यंगात्मक शैली को विकसित करेंगे ।
व्यंग्य की एक और विशेषता होती है कि इसके लेखन में कहीं भी लगना नहीं चाहिए कि आप व्यंग्य लिख रहे हैं । आपकी विषय वस्तु व कथन अपने आप में व्यंग्य को उपजाऊ बना देगी । कई बार तो पूरी रचना को पढ़ने के बाद ही अहसास होता है कि आपने व्यंगात्मक बात की है । व्यंग्य का सीधा सा तात्पर्य है कि यह पाठक को कुछ नहीं, बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दे ।
इसी के साथ श्री राजेश विक्रांत जी व्यवसाय से पत्रकार हैं और उन्होंने अधिकतर रचनाएं अपने समाचार पत्र हेतु लिखे हैं । समाचार पत्र हेतु लेखन और पुस्तक लेखन में बहुत बड़ा अंतर होता है । समाचार पत्र हेतु लिखते समय आपको संपादक की रुचि व मर्यादाओं का ध्यान रखना पडता है अर्थात आपकी एक सीमा रेखा होती है । जबकि पुस्तक लेखन में आपका स्वामी वह पाठक होता है जो आपकी पुस्तक खरीद कर पढ़ता है । इसलिए पुस्तक लेखन के समय पाठकवर्ग को ध्यान रखते हुए लिखना चाहिए । हम यह भी कह सकते हैं कि एक पत्रकार जब अपनी व्यंग्य रचनाएं पत्रिका की अपेक्षा पुस्तक हेतु रचता है तो उसे लिखने की ज्यादा स्वतंत्रता होती है ।
भारत पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित की इस पुस्तक में 50 व्यंग्य रचनाएं हैं । यदि थोडा सा ध्यान पुस्तक के प्रकाशन की गुणवत्ता की ओर दिया जाता तो निसंदेह यह सोने में सुहागा कहलाता ।
श्री राजेश विक्रांत जी के अब तक लगभग 12,000 लेख प्रकाशित हो चुके हैं । आप युवा हैं व मां सरस्वती का वरदहस्त आपके ऊपर है । हमें आशा है कि भविष्य में आपकी और भी उत्कृष्ट कृतियां पाठकों के हाथों में होगी ।
बतरस (व्यंग्य संकलन)
लेखक - राजेश विक्रांत
समीक्षक - डा. राजेश्वर उनियाल
हालांकि व्यंग्य लेख तो हमें यदाकदा पढने को मिल ही जाते हैं, परंतु व्यंग्य संकलन या व्यंग्य विधा की पुस्तकें बहुत कम उपलब्ध हो पाती हैं । इसी क्रम में जब मुझे श्री राजेश विक्रांत जी का व्यंग्य संकलन बतरस पढने को मिला तो मैंने समय निकालकर उसे पढा और पढता चला गया । सरल, सहज व बिना लाग-लपेट के व्यक्त व्यंग्य विचारों को अगर पढ़ना हो तो मैं कहूंगा कि श्री राजेश विक्रांत जी की पुस्तक एक श्रेष्ठ व्यंग्य कृति है । इस हेतु उन्हें साधुवाद ।
व्यंग्य एक ऐसी विधा है जिसमें लेखक प्रतीकात्मक ढंग से महत्वपूर्ण बातें कह जाता है । व्यंग्य गंभीर होने के साथ-साथ चोटिल होता है और चोटिल होने के लिए व्यंग्य को धारदार होना चाहिए । लेकिन स्वभाव से सीधे व सरल श्री विक्रांत प्रतीकात्मक के बजाए वर्णनात्मक पर अधिक ध्यान देते हैं तथा उनको जो कहना होता है वह सीधे-सीधे कह देते हैं ।
दूसरी बात यह है कि प्रत्येक व्यंग्यकार की अपनी एक विशिष्ट शैली होती है । वह अपनी शैली विकसित करता है और उसी शैली में व्यंग्य रचता है । इससे एक तो साहित्य भी समृद्ध होता है और साथ ही रचनाकार की भी एक छाप बनती है । आशा है कि श्री राजेश विक्रांत जी भी अपनी भावी रचनाओं में अपनी व्यंगात्मक शैली को विकसित करेंगे ।
व्यंग्य की एक और विशेषता होती है कि इसके लेखन में कहीं भी लगना नहीं चाहिए कि आप व्यंग्य लिख रहे हैं । आपकी विषय वस्तु व कथन अपने आप में व्यंग्य को उपजाऊ बना देगी । कई बार तो पूरी रचना को पढ़ने के बाद ही अहसास होता है कि आपने व्यंगात्मक बात की है । व्यंग्य का सीधा सा तात्पर्य है कि यह पाठक को कुछ नहीं, बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दे ।
इसी के साथ श्री राजेश विक्रांत जी व्यवसाय से पत्रकार हैं और उन्होंने अधिकतर रचनाएं अपने समाचार पत्र हेतु लिखे हैं । समाचार पत्र हेतु लेखन और पुस्तक लेखन में बहुत बड़ा अंतर होता है । समाचार पत्र हेतु लिखते समय आपको संपादक की रुचि व मर्यादाओं का ध्यान रखना पडता है अर्थात आपकी एक सीमा रेखा होती है । जबकि पुस्तक लेखन में आपका स्वामी वह पाठक होता है जो आपकी पुस्तक खरीद कर पढ़ता है । इसलिए पुस्तक लेखन के समय पाठकवर्ग को ध्यान रखते हुए लिखना चाहिए । हम यह भी कह सकते हैं कि एक पत्रकार जब अपनी व्यंग्य रचनाएं पत्रिका की अपेक्षा पुस्तक हेतु रचता है तो उसे लिखने की ज्यादा स्वतंत्रता होती है ।
भारत पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित की इस पुस्तक में 50 व्यंग्य रचनाएं हैं । यदि थोडा सा ध्यान पुस्तक के प्रकाशन की गुणवत्ता की ओर दिया जाता तो निसंदेह यह सोने में सुहागा कहलाता ।
श्री राजेश विक्रांत जी के अब तक लगभग 12,000 लेख प्रकाशित हो चुके हैं । आप युवा हैं व मां सरस्वती का वरदहस्त आपके ऊपर है । हमें आशा है कि भविष्य में आपकी और भी उत्कृष्ट कृतियां पाठकों के हाथों में होगी ।