शनिवार, 2 जुलाई 2016

रसदार है बतरस!- अवनींद्र आशुतोष

रसदार है बतरस!
- अवनींद्र आशुतोष
शब्दों की यात्रा आरंभ करना सहज नहीं है। साहित्य, संस्कृति और संस्कार सबके पृथक होते हैं। किंतु वर्तमान समय में जहां कलम का अधिकतम स्थान 'की बोर्ड' ने अधिग्रहित कर लिया है, राजेश विक्रांत की जिजीविषा ही कही जाएगी कि इनकी लेखनी मौलिकता के द्रुतगति मार्ग पर कलम से लैस होकर जिस गति से गंतव्य तक सरपट  भागी जा रही है वह अद्भुत है। राजेश विक्रांत केवल एक लेखक नहीं हैं, अपितु एक कुशल और चतुर अवलोकनकर्ता भी हैं इसलिए इनकी लेखनी रसदार होती है। इसे मैं आज से नहीं बल्कि 1993 से महसूस कर रहा हूँ, दोपहर का सामना के शुरूआती दिनों से। वे बोझिल से बोझिल विषय को रोचक बना देने की कला जानते हैं। विज्ञान व तकनीकी विषय हो या आर्थिक वे रस घोल ही देते हैं।
बतरस राजेश विक्रांत की प्रथम मौलिक पुस्तक है। इससे पहले सम्पादन, संकलन और अनुवाद तो बहुत किये, पर यह पहली निजी पुस्तक है। मुझे यह भी कहना है कि उनके व्यंग्य का मैं लगभग 22 साल पुराना पाठक हूँ। शायद 1994 के आसपास सामना में ही उन्होंने एक व्यंग्य लिखा था जिसका शीर्षक साहित्य का अश्वेत पत्र रहा होगा। उसका जो तेवर था वह बतरस में भी मौजूद है। इसमें भी राजेश ने व्यंग्य और संवेदना को एक नया आयाम दिया है। प्रायः हमने देखा है कि अनेक विद्वान अनेक बार अपने लेखन के मूल मार्ग से विचलित होकर विषयांतर तक हो जाते हैं, परंतु राजेश अपनी लेखनी की जमीन इस प्रकार मजबूत कर लेते हैं कि पाठक बिना कुछ अन्य विचार किए इनके लेखन का कायल हो जाता है।
मैं एक लेखक की सफलता का आकलन इस आधार पर भी करता हूं कि बोझिल विषय पर लिखते समय पाठकों को पकड़े रहने में उसे कितनी महारथ प्राप्त है, इस बारे में राजेश की रसदार बतरस एक उदाहरण है। बतरस का महत्व मेरी दृष्टि में इसलिए भी है क्योंकि मुम्बई के भारत पब्लिकेशन ने राजेश की प्रतिभा को समझा और उसे हमारे और आपके समक्ष प्रस्तुत किया। इस नेक कार्य के लिये भारत पब्लिकेशन और प्रकाशक सुश्री कमर जबीं को साधुवाद।
बतरस से दोपहर का सामना के पाठक भलीभांति परिचित हैं। आठ नौ सालों से यह कालम निरन्तर चल रहा है। उसी में से चुने गए 50 लेख बतरस में समाहित किये गए हैं। पहले लेख (एक सच्ची) भूमिका के अनुसार राजेश की पत्नी शर्मिला की दृष्टि में व्यंग्य की औकात कूड़ा है, किंतु यह राजेश विक्रांत की लेखनी का ही जादू है कि पत्नी की सोच बदलकर जो कीर्तिमान उन्होंने स्थापित किया है वह पुस्तक के पन्ने दर पन्ने पाठकों को गुदगुदाने के साथ सोचने पर मजबूर कर देता है। मेरा गांव मेरा देश, प्यार की बातें, विकास का वड्रा मॉडल, अथ श्री कचहरी कथा, सम्मान की भूख, शिक्षा बनाम त्याग, जियो टानी ब्लेयर, तलवार की धार, अपने बारे में, एक सुखी दिन, लोकार्पण एक लघु प्रबन्ध, चलो गांव की ओर आदि लेख बहुत बढ़िया बन गए हैं जबकि शीर्षक लेख 'बतरस' तो संग्रह में मील का पत्थर जैसा है। पूरी की पूरी पुस्तक 'बतरस' वाकई पठनीय है क्योंकि इसमें व्यंग्य का प्राण है।
समीक्षक मुम्बई के जाने माने पत्रकार हैं।

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