शनिवार, 5 जनवरी 2013

जलवायु परिवर्तन पर गंभीर कब होंगे हम
इस साल नए साल पर मेरा छोटा पुत्र अभिनव मुंबई में था। वह लातूर के एमआईएमएसआर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस का छात्र है। नए साल पर उसने मेरे सामने क्लाइमेट चेंज का मुद्दा रखा कि आखिर हम क्यों इस पर गंभीर नहीं हैं। मेडिकल के उस छात्र ने गलोबल वार्मिंग से लेकर क्लाइमेंट चेंज तक एक लंबी चर्चा की जिसने मुझे इस मामले को आपसे शेयर करने की प्रेरणा दी।
अभिनव का कहना एकदम सही है कि भविष्य में गलोबल वार्मिंग में बढ़त को लेकर व्यक्त की गई संभावनाएं काफी चिंताजनक हैं। वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की अधिकता की वजह से आने वाले दशकों में गर्मी बढेगी और इससे स्वाभाविक रूप से धरती की सतह के तापमान में २ से ५ डिग्री सेल्सियस का इजाफा होने की चिंता जलवायु वैज्ञानिकों ने काफी पहले से ही व्यक्त कर रखी है।
फिर क्यों अमेरिका व ज्यादा धनवान देशों ने अपने को इस चिंता से मुक्त कर लिया है या फिर आखिर क्यों उन्होंने इसमें रूचि लेनी खत्म कर दी। दरअसल इसका कारण यह है कि वे अब इसके प्रभारी नहीं रह गए हैं विकासशील देशों ने गलोबल वार्मिंग का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है।
पश्चिम की अरूचि को और गहराई से जानें। दरअसल तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में जीवाश्म ईंधन जलाना ही तापमान में बढोतरी का कारण है। २००६ में चीन ने अमेरिका को कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन के मामले में पीछे ढकेल दिया था। अपनी १० फीसदी सालाना वृद्धि के साथ यह फिलहाल अमेरिका से दूनी कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जित कर रहा है। हालांकि अमेरिका इसमे पिछले २० सालों में एकदम निचले स्तर पर है। 
मान लें कि अमेरिका उत्सर्जन को शून्य कर दे तो भी इसकी मौजूदा वृद्धि दर पर चीन अकेले तीन साल में ही इस अंतर को भर देगा। ऐसी ही वृद्धि दर भारत की भी है। यानी कि उत्सर्जन कम करके भी अमेरिका गलोबल वार्मिंग को नियंत्रित नहीं कर पाएगा।
इसलिए इसमें आरोपों की बजाय प्रैक्टिकल होना होगा। अगर चर्चा के दौरान प्रेसीडेंट ओबामा या गवर्नर मिट रोमनी से पूछा जाता तो उनके सुझाव क्या होंगे। शायद धनवान देश कोई मिसाल पेश करें। बात अच्छी है बशर्ते उसका अनुकरण विकासशील देशों के लिए संभव हो तो।
रिनेवेबल्स के विकास की गति बहुत धीमी है। सूर्य प्रकाश के इस्तेमाल में वल्र्ड लीडर चीन ने २ गीगावाट्स क्षमता की सोलर सेल एड की हैं। पर यहां पर क्षमता का मतलब अलग है जो कि वास्तविक रूप में १/४ गीगावाट्स ही होता है जबकि चीन हर साल ५० गीगावाट्स की जीवाश्म ईंधन पॉवर पैदा करता है। इस भिन्नता की वजह से ही क्योटो/कोपेनहेगन/कानकुन/दोहा वार्ताओं पर बात रूक गई। वैसे विकासशील देश यह तो मानते हैं कि गलोबल वार्मिंग उनकी समस्या है पर उनके यहां और भी समस्याएं हैं-गरीबी, कुपोषण, सेहत। इन मुद्दों को अमूमन आर्थिक वृद्धि के नजरिए से देखा जाता है। इस मामले में उनकी सोच अलग है। हां, विकसित देश भी पहल करें। पर क्या यह चीन, भारत, इंडोनेशिया व अन्य देशों में काम करेगा। क्या वे उत्सर्जन में कमी अफोर्ड कर पाएंगे, मैं ऐसा नहीं सोचता। पश्चिम उस क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म को ज्यादा अफोर्ड नहीं कर सकता जिसमें देशों को क्लीनर पॉवर प्लांट्स लगाने के लिए भुगतान किया जाता है।
इसका समाधान है। क्या हम क्लीन फ्रैकिंग स्टैंडर्ड विक सित कर सकते हैं। इसके लिए गैस विकास कंपनियों व पर्यावरणविदों को साथ-साथ काम करना होगा। अमेरिका में यह स्टैंडर्ड बिना किसी सरकारी मदद या सब्सिडी के बेहतर चल रहा है। यह सस्ता होने के साथ कम इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत वाला है, पाइपलाइनों का निर्माण रेल लाइनों की तुलना में कम खर्चीला है। अगर हम ऐसा कर पाए तो समझिए हमारी जीत हो गई।
पर विकासशील देश ऐसा क्यों नहीं सोचते। हालांकि इसमें लंबा समय लगेगा पर फै्रक्रिंग तकनीक भी अमेरिका में कई दशकों तक ऐसी हालत में ही थी। एक संभावित समाधान तकनीक ट्रांसफर है। तकनीक खरीदने का खर्च वैकल्पिक साधनों से कम ही बैठेगा। आईएमएफ के पूर्व प्रमुख अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रिलियन डॉलर की बचत होगी। इससे प्राकृतिक गैस उद्योग की छवि भी बेहतर होगी। हालांकि प्राकृतिक गैस की ओर स्विच लांग टर्म सोल्यूशन तो नहीं है पर इससे हमें काफी समय मिल जाएगा और तब तक हम कोई सही व टिकाऊ रास्ता जरूर खोज लेंगे। हम इस चिंता से बचें, यही मेरी शुभकामना है।




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