शनिवार, 5 जनवरी 2013

बेमिसाल मुंबई

एक शहर/ बिला नागा रोज/ इंतजार करता है/ लोकल का/ एक शहर/ लगभग दौडता हुआ/ चढ़ता है लोकल में/ एक शहर भागता हुआ सा/ उतरता है लोकल से/ एक शहर आखिकार/ समा जाता है/ पहियों पर सवार एक बड़े शहर में। यह पङ्क्षक्तयां हैं कवि सुधीर सक्सेना ने उन्होंने मुंबई के बारे में लिखी हैं। मुंबई के बारे में जब भी मुझे कुछ लिखने का मौका आता है तब मेरी यादों में इसी कविता की तरह ही कई तरह के  उतार-चढाव आने लगते हैं। जैसा कवि ने सहसूस किया है ठीक उसी तरह के अनुभव, कई सपनें व स्मृतियां मेरा पीछा करने लगती हैं। मैं १९८९ से लगातार इस शहर में हूं। जन्मभूमि अमेठी से ज्यादा इस शहर के प्रति प्यार है मेरे मन में।  यही मेंरी कर्मभूमि है और ऐसी कर्मभूमि जिसने मुझे बहुत सारा कुछ दिया। पद प्रतिष्ठा सम्मान सारा कुछ मुझे यहीं से मिला। सच पूछा जाए तो मुंबई का मैं आजीवन कर्जदार रहूंगा।

अगर हम मुंबई के इतिहास में जाएं तो कांदिवली पूर्व के निकट मिले प्राचीन अवशेष संकेत देते हैं मुंबई पाषाण युग से बसी हुई है। वैसे यह पहले सात छोटे-छोटे द्वीपों का समूह था। मुंबई यानी मुंबा देवी और आई अर्थात मराठी में मां,  जिसका बॉम्बे नाम सोलहवीं सदी में पुर्तगालियों के यहां पर आगमन के बाद पडा। दरअसल पुर्तगाली  में अच्छी खाड़ी को गुड बे कहते हैं और इसे बाम-बे कहा जाने लगा।

मुंंबई के नाम पर आर्थिक-वाणिज्यिक जगत के कई विशेषण दर्ज हैं। देश की पहली सबसे ज्यादा आबादी वाली नगरी। भारतीय फिल्मों का जन्म स्थान। बॉलीवुड। भारत का प्रवेश द्वार क्योंकि यूरोप, अमेरिका, अफ्रीका आदि पश्चिमी देशों से जलमार्ग या वायुमार्ग से आने वाले यात्री या पर्यटक सबसे पहले मुंबई ही आते हैं। देश का सर्व वृहत्तम वाणिज्यिक केंद्र जिसकी भारत के जीडीपी-सकल घरेलू उत्पाद में ५ फीसदी हिस्सेदारी है। संपूर्ण भारत के औद्योगिक उत्पादन का २५ फीसदी यहीं होता है। भारत की आर्थिक राजधानी। इकॉनामिक पॉवर हाउस ऑफ इंडिया। समस्त आयकर संग्रह का ४० फीसदी, सभी सीमा शुल्क संग्रह का ६० फीसदी तथा केंद्रीय राजस्व का २० फीसदी यहीं होता है।

सुधीर सक्सेना ने मुंंबई पर आधारित अपनी एक और कविता में लिखा है- जब भी कोई नन्हीं मछली/ पहुंचती है/ मछलियों की पाठशाला में/ बड़ी मछली सुनाती है उसे/ मुंबई की कथा/ पानी में गोल घेरा बना मछलियां गाती हैं/  मुंबई के गीत/ बरसों का संग-साथ है/  मुंबई और मछलियों का/ तभी तो/  रात में देखो तो/ मंत्रालय की सबसे उपरली मंजिल से/  खुबसूरत एक्वेरियम में रखी/  जगर -मगर करती बडी सी/ मछली नजर आती है मुंबई।

अन्य लेखकों, कवियों व पत्रकारों की तरह मैं भी मुंबई को अजीब-विरोधाभाषों का शहर मानता हूं। भारत की गोल्डेन मेट्रोपॉलिटन सिटी, मायानगरी, सबसे तेज व प्रभावशाली महानगर के रूप में सुपरिचित मुंबई में एक ओर तो एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी धारावी है तो दूसरी ओर गगनचुंबी अट्टालिकाओं वाली सैक्डों पॉश व अत्याधुनिक कालोनियां हैं। मेरे परम प्रिय दोस्त मुंबई के ही कवि गीतकार देवमणि पांडेय ने अपनी एक सुप्रसिद्ध कविता शहर: एक अहसास में लिखा है-
सडक से सागर तक
तनहाई में लिपटा हुआ शहर
तीखे शोरगुल में
डूबता उतराता है
भीड में रोज
छिल जाते हैं तनमन

राह चलते अनायास
निगाहें टकराती हैं
और उग आते हैं
अपेक्षा और अपमान के अनगिनत कांटे
आखिर कभी तो उतरेगा
पराएपन का केंचुल
और जागेगी मन में उम्मीद-

यह शहर मेरा है
यह सडक मेरी है
यह भीड मेरी है
और भीड़ की हर आंख में
उभरता अक्स मेरा है। 
तो ऐसी है अपनी मुंबई। एक अलग खुशबू लिए हुए शहर है यह। यहां के तकरीबन हर इलाके में मॉल्स, मल्टीप्लेक्स, पब, फाइव स्टार, सेवन स्टार होटलों की भरमार है तो मुंबई की आबादी की एक हिस्सा सडक़ों पर जीवन बिताता है। लाकल ट्रेनों की भीड है तो बसों-टैक्सियों-रिक्शों के लिए खड़ी पक्तिबद्ध जनता भी है जो लोगों को अनुशासन का पालन करना सिखाती है। इस शहर को मेरा सौ-सौ सलाम।
जलवायु परिवर्तन पर गंभीर कब होंगे हम
इस साल नए साल पर मेरा छोटा पुत्र अभिनव मुंबई में था। वह लातूर के एमआईएमएसआर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस का छात्र है। नए साल पर उसने मेरे सामने क्लाइमेट चेंज का मुद्दा रखा कि आखिर हम क्यों इस पर गंभीर नहीं हैं। मेडिकल के उस छात्र ने गलोबल वार्मिंग से लेकर क्लाइमेंट चेंज तक एक लंबी चर्चा की जिसने मुझे इस मामले को आपसे शेयर करने की प्रेरणा दी।
अभिनव का कहना एकदम सही है कि भविष्य में गलोबल वार्मिंग में बढ़त को लेकर व्यक्त की गई संभावनाएं काफी चिंताजनक हैं। वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की अधिकता की वजह से आने वाले दशकों में गर्मी बढेगी और इससे स्वाभाविक रूप से धरती की सतह के तापमान में २ से ५ डिग्री सेल्सियस का इजाफा होने की चिंता जलवायु वैज्ञानिकों ने काफी पहले से ही व्यक्त कर रखी है।
फिर क्यों अमेरिका व ज्यादा धनवान देशों ने अपने को इस चिंता से मुक्त कर लिया है या फिर आखिर क्यों उन्होंने इसमें रूचि लेनी खत्म कर दी। दरअसल इसका कारण यह है कि वे अब इसके प्रभारी नहीं रह गए हैं विकासशील देशों ने गलोबल वार्मिंग का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है।
पश्चिम की अरूचि को और गहराई से जानें। दरअसल तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में जीवाश्म ईंधन जलाना ही तापमान में बढोतरी का कारण है। २००६ में चीन ने अमेरिका को कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जन के मामले में पीछे ढकेल दिया था। अपनी १० फीसदी सालाना वृद्धि के साथ यह फिलहाल अमेरिका से दूनी कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जित कर रहा है। हालांकि अमेरिका इसमे पिछले २० सालों में एकदम निचले स्तर पर है। 
मान लें कि अमेरिका उत्सर्जन को शून्य कर दे तो भी इसकी मौजूदा वृद्धि दर पर चीन अकेले तीन साल में ही इस अंतर को भर देगा। ऐसी ही वृद्धि दर भारत की भी है। यानी कि उत्सर्जन कम करके भी अमेरिका गलोबल वार्मिंग को नियंत्रित नहीं कर पाएगा।
इसलिए इसमें आरोपों की बजाय प्रैक्टिकल होना होगा। अगर चर्चा के दौरान प्रेसीडेंट ओबामा या गवर्नर मिट रोमनी से पूछा जाता तो उनके सुझाव क्या होंगे। शायद धनवान देश कोई मिसाल पेश करें। बात अच्छी है बशर्ते उसका अनुकरण विकासशील देशों के लिए संभव हो तो।
रिनेवेबल्स के विकास की गति बहुत धीमी है। सूर्य प्रकाश के इस्तेमाल में वल्र्ड लीडर चीन ने २ गीगावाट्स क्षमता की सोलर सेल एड की हैं। पर यहां पर क्षमता का मतलब अलग है जो कि वास्तविक रूप में १/४ गीगावाट्स ही होता है जबकि चीन हर साल ५० गीगावाट्स की जीवाश्म ईंधन पॉवर पैदा करता है। इस भिन्नता की वजह से ही क्योटो/कोपेनहेगन/कानकुन/दोहा वार्ताओं पर बात रूक गई। वैसे विकासशील देश यह तो मानते हैं कि गलोबल वार्मिंग उनकी समस्या है पर उनके यहां और भी समस्याएं हैं-गरीबी, कुपोषण, सेहत। इन मुद्दों को अमूमन आर्थिक वृद्धि के नजरिए से देखा जाता है। इस मामले में उनकी सोच अलग है। हां, विकसित देश भी पहल करें। पर क्या यह चीन, भारत, इंडोनेशिया व अन्य देशों में काम करेगा। क्या वे उत्सर्जन में कमी अफोर्ड कर पाएंगे, मैं ऐसा नहीं सोचता। पश्चिम उस क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म को ज्यादा अफोर्ड नहीं कर सकता जिसमें देशों को क्लीनर पॉवर प्लांट्स लगाने के लिए भुगतान किया जाता है।
इसका समाधान है। क्या हम क्लीन फ्रैकिंग स्टैंडर्ड विक सित कर सकते हैं। इसके लिए गैस विकास कंपनियों व पर्यावरणविदों को साथ-साथ काम करना होगा। अमेरिका में यह स्टैंडर्ड बिना किसी सरकारी मदद या सब्सिडी के बेहतर चल रहा है। यह सस्ता होने के साथ कम इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत वाला है, पाइपलाइनों का निर्माण रेल लाइनों की तुलना में कम खर्चीला है। अगर हम ऐसा कर पाए तो समझिए हमारी जीत हो गई।
पर विकासशील देश ऐसा क्यों नहीं सोचते। हालांकि इसमें लंबा समय लगेगा पर फै्रक्रिंग तकनीक भी अमेरिका में कई दशकों तक ऐसी हालत में ही थी। एक संभावित समाधान तकनीक ट्रांसफर है। तकनीक खरीदने का खर्च वैकल्पिक साधनों से कम ही बैठेगा। आईएमएफ के पूर्व प्रमुख अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रिलियन डॉलर की बचत होगी। इससे प्राकृतिक गैस उद्योग की छवि भी बेहतर होगी। हालांकि प्राकृतिक गैस की ओर स्विच लांग टर्म सोल्यूशन तो नहीं है पर इससे हमें काफी समय मिल जाएगा और तब तक हम कोई सही व टिकाऊ रास्ता जरूर खोज लेंगे। हम इस चिंता से बचें, यही मेरी शुभकामना है।