सोमवार, 8 अगस्त 2011
नंबर एक चीन: कहीं डर की तो बात नहीं
राजेश विक्रांत
चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है और अभी पिछले ही दिनों अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष-आईएमएफ ने तमाम संभावनाओं का समर्थन करते हुए अपनी ओर से भी इस बात की पुष्टि कर दी है। आईएमएफ के मुताबिक चीन जल्दी ही अमेरिका को पिछाड़ कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा। चीन जिस तर से आगे बढ़ रहा है उसके चलते पिछले कई सालों से दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री तो इस विषय में एक मत भी हैं। हालांकि अगर आज के माहौल में बात करें तो चीन का पर कैपिटा सकल घरेलू उत्पाद-जीडीपी सबसे बड़ी संभावित अर्थव्यववस्था संबंधी मानकों पर खरा नहीं उतरता। यानी कि आज की तारीख में चीन की पर कैपिटा जीडीपी संतोषजनक स्तर पर नहीं है। पर चीन की जीडीपी रफ्तार के चलते आज की दुनिया का सोचना व उसका रूझान एकदम साफ है। जीडीपी के लिहाज से ज्यादा संभावना तो इसी दशक की है, नहीं तो अगले दशक तक चीन जरूर नंबर एक होकर अमेरिका को दूसरे स्थान पर ढकेल देगा।
इस संभावित उपलब्धि पर चीनी काफी खुश हैं। उनमें दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के प्रति काफी उत्साह है और वे अब प्रसन्नता के खुमार में यह भी सोचने लगे हैं या यूं कहा जाए तो बेहतर होगा कि वे कुछ इसी तरह के सपने भी देखने लगे हैं कि दुनिया के हर हिस्सों के के राष्ट्रीय व अतंरराष्ट्रीय मामलों में अब उनका असर बढ़ जाएगा। हर जगह उनकी बात को वजन मिलेगा। वे जैसा चाहेंगे शेष विश्व पर अपनी राय थोपेंगे। यह बात ठीक उसी तरह है जैसे आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका अपनी टांग हर जगह फंसाता फिरता है, दुनिया के हर कोने में दुनिया की नंबर एक अर्थव्यवस्था की गर्मी की वजह सेअमेरिका दादागिरी करने के लिए हर समय आतुर रहता है। उधर शेष विश्व भी इसी तरह सोच रहा है। उसका संदेह यह है कि चीनी कहीं आगे चल कर दादागिरी न करना शुरू कर दें। पर इस बारे में अंतरराष्ट्रीय पॉलिसी की समझ रखने वाले जानकारों का कहना है कि इस बारें में चीन के संदर्भ में चिंता नहीं करनी चाहिए। रैंकिंग में नंबर एक होने से अपने आप ताकत व प्रभाव तो नहीं आ जाता है। इसके लिए और भी कारकों की दरकार होती है। दरअसल यह उस देश की सोच व मानसिकता पर निर्भर है कि वह अपनी ताकत को अच्छे या बुरे के लिए कैसे इस्तेमाल करता है? पर फिलहाल इस बारे मे कई प्रकार के तर्क दिए जा रहे हैं। लेकिन क्या सचमुच में अमेरिका या शेष दुनिया के लिए चीन का दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना वाकई में खतरे की घंटी है?
जानकारों का कहना है कि बिलकुल नहीं। किसी को डरने या घबराने की जरूरत नहीं हैं। वैसे यह भी आश्चर्यजनक है कि चीन ने काफी तेजी से प्रगति की है। १९४९ में जब चीन कम्यूनिस्ट पार्टी सत्ता में आई तो चीन एक सदी से ज्यादा के पतन व खराब हालातों के चलते बहुत गरीब देश था, तीस साल बाद भी वह राजनीतिक उतार-चढ़ाव की वजह से गरीब देश था। पर चीनी नेताओं ने केंद्रीय योजना, आंतरिक निवेश द्वारा एक्सपोर्ट आधारित वृद्धि व स्थनीय पहल के जरिए नया इतिहास रचा और दूरदर्शिता पूर्ण नीतियों की वजह से चीन के हालात बदलने लगे। सुपरिणाम लाखों-करोड़ों चीनियों का जीवन स्तर सुधरा व आज देश का चेहरा बदल गया है। वह उद्योग-व्यापार कारोबार व उत्पादन में आज दुनिया में बहुत अच्छी हैसियत रखता है। दरअसल चीनी अपने गौरव व अपनी गरिमा में भरपूर भरोसा करते हैं लिहाजा उनका गौरव वापस लौटा है और वे इन दिनों दुनिया की महान ताकतों में से एक के रूप में हमारे सामने हैं। हालांकि उनकी ताकत उस अमेरिका के नुकसान पर है जिसके साथ चीन ने पिछले ६० सालों से कठिन रिश्ता रखा है। वैसे कु छ चीनियों को भरोसा है कि मील का पत्थर पार कर लेने के बाद वे स्वयमेव अंतरराष्ट्रीय ताकत बन जाएंगे व उनके पास अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव आ जाएगा। अन्य देश भी उनके महत्व को स्वीकार करेगे व आने वाले दिनों में ऐसा भी हो सकता है कि बीजिंग यह दबाव डालने लगे कि आईएमएफ या विश्व बैंक का प्रमुख चीनी ही हो।
इन दिनों अंतरराष्ट्रीय गलियारों में इस प्रकार की चर्चा हो रही है कि सर्वाधिक जीडीपी वाला चीन या एक नई ताकत अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को नए दबाव में रख सकता है। आर्थिक ताकत सैन्य ताकत व राजनीतिक प्रभाव में बदल भी सकती है, पर जर्मनी बनाम ग्रेट ब्रिटेन के मामले से संबंधित इतिहास बताता है कि इस बारे में ज्यादा उथल-पुथल की संभावना नहीं है। पहले विश्व युद्ध के एक साल पहले १९१३ में अमेरिका ५०० बिलियन डॉलर के साथ दुनिया में सबसे ज्यादा जीडीपी वाला देश था। तब जर्मनी की २२५ बिलियन डॉलर, ग्रेट ब्रिटेन की २४० बिलियन डॉलर, जबकि रूस, चीन व फ्रांस की ११४ बिलियन डॉलर व जापान की जीडीपी सिर्फ ७१ बिलियन डॉलर थी। पहली बात इससे यह जाहिर होती है सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब बड़ी अंतरराष्ट्रीय ताकत नहीं होता। उस समय अमेरिका की आवाज की कोई कीमत नहीं थी। दूसरी बात सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब बड़ी सैनिक ताकत भी नहीं, १९१३ में अमेरिका के पास अपेक्षाकृत कम सैन्य ताकत थी जबकि जर्मनी व जापान के पास आर्थिक ताकत की तुलना में ज्यादा सैन्य शक्ति थी। बहरहाल आज एक सदी पहले के मापदंड नहीं चलेंगे। तीसरी बात नंबर एक अर्थव्यवस्था का मतलब अंतरराष्ट्रीय तनाव में वृद्धि भी नहीं है। चौथी बात यह कि जब तनाव पैदा होता है वह किसी उभरती ताकत के चलते नहीं होता। १९१४ में जर्मनी ने विश्व युद्ध में कूदने का फैसला एलायंस के दबाव की वजह से लिया था। इसी तरह से ब्रिटेन व रूस के साथ भी हुआ।
यानी कि आर्थिक रैंकिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण बात ताकत होती है। जब आपके अंदर आत्मविश्वास रहेगा तभी आप कुछ कर पाएंगे। अन्यथा आप शून्य हैं। दुनिया में फिर कोई भी देश आपकी आवाज, बात या निवेदन नहीं सुनेगा। क्योंकि उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं जबकि डूबते सूरज को कोई नहीं पूछता। चीन की आंतरिक ताकतों पर एक विशेषज्ञ के रूप में जॉन एल थार्टंन चाइना सेंटर के निदेशक केनेथ लिर्बथल कहते हैं कि चीन अपनी आंतरिक ताकत को अच्छी तरह से जानता है। वह बिना सोचे-समझे कोई कदम नहीं उठाएगा इसकी बजाय वह अन्य प्रमुख ताकतों के साथ मिल कर काम करेगा क्योंकि इस बात को चीन बहुत अच्छी तरह से जानता भी है कि उसकी ताकत तो दूसरे देशों के सहयोग से आई है व अभी भी आ रही है। जब दूसरे देश उसे सहयोग करना या समर्थन देना बंद कर देंगे तो उसकी ताकत कोई कीमत नहीं रह जाएगी। लिहाजा चीन अतंरराष्ट्रीय प्रणालियों व मामलों पर थोड़ा दबाव तो बना सकता है पर इससे ज्यादा कुछ होने की संभावना नहीं दिखती है। वैसे अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा का प्रशासन भी कुछ इसी तरह की बात सोचता है।
अगर चीन नंबर एक बन जाता है तो अमेरिका के पास भी कई प्रकार की च्वॉइस हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय लीडरशिप से तब उसे थोड़ा समय मिलेगा और नंबर २ के रूप में वह कुछ और भी महत्वपूर्ण काम कर सकता है। यह काम उसके आंतरिक फायदे के लिए होंगे। वह सरकारी वित्त, शिक्षा, विज्ञान व तकनीक सरीखे राष्ट्रीय महत्व के उन कई मुद्दों पर अपना फोकस कर सकता है जो अब तक थोड़ा उपेक्षित भी रहे हैं। फिर चिंता की क्या बात? हम आप आखिर क्यों डरें? भय का आखिर क्या कारण हा? आजकल के हालात बता रहे हैं कि चीन विवाद की बजाय सहकारिता का संकेत दे रहा है। यानी अगर इन दिनों चीन दुनिया की नंबर एक अर्थव्वस्था बनने के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है तो यह कोई कारण न हुआ कि अमेरिकी पहाड़ों की ओर चले जाएं। कुल मिला कर चीन के नंबर एक होने से किसी को भी डरने की कोई जरूरत नहीं है।
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