मंगलवार, 9 अगस्त 2011

आज के डॉक्टरों के लिए: आप मानवता को न भूलिए


राजेश विक्रांत



मेरे १९ साल के छोटे पुत्र अभिनव की बचपन से ही इच्छा डॉक्टर बनने की है। मुझे याद आती है उसकी बातें जो कि वह ५-६ साल की उम्र से ही कहता चला आ रहा है। जब भी कोई पूछे कि बेटे बड़े होक र क्या बनोगे, वह तुरंत जवाब देता है-डॉक्टर। क्यों बनना चाहते हो? समाज सेवा करनेे के लिए। मेरी स्वर्गीय पिताश्री उसकी इस इच्छा व इस तरह के विचार व सोच से बेहद खुश व गर्वीले रहते थे कि मेरा यह नाती परिवार का पहला डॉक्टर बनने की अभिलाषा आज भी अपने मन में याद रखे हुए है। और वह समाज सेवा करने के लिए डॉक्टर बनना चाहता है। मेरे पिता जी का तो ४ नवंबर २००७ को स्वर्गवास हो गया। फिर भी आज भी हम उनकी इच्छा की पूर्ति के लिए प्रयास रत हैं और आज तक अभिनव भी अपनी इच्छा को असलियत का जामा पहनाने की जिद पर कायम है, वह एक भी मिनट के लिए अपनी आकांक्षा या अपनी मंजिल को भूला नहीं है। मैं उसके इस जज्बे को सलाम करता हूं कि आज जब डॉक्टरी का पेशा मानवता को समर्पित पेशा नहीं रह गया है। फिर भी अभिनव समाज सेवा करने के लिए डॉक्टर बनना चाहता है। मैं और मेरी पत्नी शर्मिला जब भी उसे समझाते हैं तब एक बात जरूर कहते हैं कि बेटा इस नोबल पेशे की नैतिकताओं को कभी भूलना नहीं।
मेरी ईश्वर से हमेशा प्रार्थना रहती है कि डॉक्टरी का पेशा मानवता का पेशा बना रहे। वैसे तो डॉक्टरी का पेशा इंसानियत व नैतिकता से परिपूर्ण माना जाता है पर इसकी परवाह आज की भौतिकतावादी दुनिया में इसकी परवाह करने वाले कम ही मिलते हैं। और ऐसे हालात देश दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गाहे-बगाहे दिखते रहते हैं। गलत दवाएं , गलत या गैरजरूरी ऑपरेशनों के भंवरजाल में मेडिकल प्रोफेशनल्स मरीजों को उलझा कर उन्हें शारीरिक व आर्थिक दोनों रूपों से लाचार बनाने की कोशिश या षडयंत्र में लगे रहते हैं, ऐसी खबरें अब मीडिया में आम हो गई हैं। अब इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में यह सवाल बड़ा सामयिक हो गया है कि हम लापरवाह व लालची डॉक्टरों की बढ़ती जमात पर आखिर कैसे लगाम लगाएं?
मैं पिछले साल यानी २०१० के जुलाई महीने का एक निजी अनुभव आप सबसे बांटना चाहता हूं। मेरा साला गुड्डू मई महीने में दवा कराने के लिए मेरे पास मुंबई आया। हम उसके इलाज के सिलसिले में एक डॉक्टर से मिले। पहले तो डॉक्टर ने कई हजार रुपए के अनाप-शनाप टेस्ट करवा दिए। ऐसे टेस्ट जिनकी जरूरत शायद ही रही हो। टेस्ट तक बात सीमित रहती तो गनीमत। लेकिन डॉक्टर महोदय उतने में थोड़े संतुष्ट होने वाले नहीं थे। उनकी लालच का दायरा काफी विस्तृत था। डॉक्टर की इस भयंकर व अमानवीय लालच ने एक निजी नर्सिंग होम में ऐसा ऑपरेशन करवाने पर भी मजबूर कर दिया जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन यहां पर डॉक्टर, सर्जन व नर्सिंंग होम की तिकड़ी को तो लूटपाट करना था। उन्हें मरीज के अच्छा होने से कोई मतलब नहीं था। उन्हें तो अपनी जेब भरनी थी। वे सभी लालच के वशीभूत थे। भले ही वे अनैतिक या लुटेरे कहे जाएं, क्या फर्क पड़ता है? यह मामला जानबूझ कर की गई लापवाही की अक्षम्य मिसाल था। जो इलाज कुछ हजार रुपए में किया जा सकता था, उसमें मेरे अंतत: १ लाख रुपए से ज्यादा खर्च हो गए और इन दुष्कर विषम परिस्थितियों श्री गुड्डू उर्फ प्रदीप बुरी तरह से ऐसे फंस गए कि उनकी जान पर बन आई। तकरीबन दो महीने तक मरीज, परिजनों, व रिश्तेदारों को शारीरिक व मानसिक परेशानी जो झेलनी पड़ी वह अलग रही।

चिकित्सकों की बिरादरी के लापरवाही के किस्से हम सुनते ही रहे हैं। यह बात सही है कि गलतियां इंसान से ही होती हैं। पर जब मेडिकल साइंस में मानवीय भूलों का मतलब किसी की जान से खेल जाना या उसे आजीवन अपंग अथवा बेकार कर देना हो जाए तब मामले को गंभीर नजरिए से देखने की जरूरत है। दरअसल, यहां पर एक खात बात को ध्यान रखना भी जरूरी है कि किसी जेनुइन गलती या अनजाने में हुई त्रुटि और मरीज के प्रति जानबूझकर की गई लापरवाही अथवा ज्यादा पैसा खींचने के लिए किए गए कृत्य के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है। यहां पर हम मानते हैं कि अब जमाना काफी आगे बढ़ चुका है। मैडिकल साइंस ने काफी तरक्की कर ली है। विज्ञान व तकनीक की वजह से मरीजों का निदान व उपचार अत्यंत सरल व सहज हो चुका है। और आज गंभीर से गंभीर बीमारियों का उपचार धड़ल्ले से होता है तथा प्राचीन काल के उपचार की पुरानी परंपराएं अब जा चुकी हैं और उनका स्थान फॉम्र्स, बीमा, वेलनेस इंश्योरेंस, हेल्थ केयर, कॉर्पोरेट मेडिसिन व बोर्डरूम मेडिकल के नवीनतम विशेषज्ञों ने लिया है। पर इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि चूकों के जरिए किसी की जान पर बन आने वाला माहौल पैदा करना जरूरी है।

मरीज व उसके परिवार के लोगों और चिकित्सकीय बिरादरी के बीच के वातावरण की भी बात आना यहां पर आवश्यक है। ध्यान रहे कि मास मेडिसिन में गलतियों की मात्रा ज्यादा ऊंची रहने की संभावना होती है। हालांकि तब मरीज असहाय होता और कुछ भी कर सकने में असमर्थ होता है फिर भी वह डॉक्टरों के निर्देश का पालन करता है और वह औसत से नीचे गुणवत्ता वाली देख-रेख के लिए भी अपनी नाक तक भुगतान करने के लिए अभिशप्त होता है। इन्हीं कारणों से अब यह कहा जाने लगा है कि स्वास्थ्य को अब मानवीय कमजोरियों का लाभ उठाने हेतु एक बड़े मौके के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। जब आप बीमार होते हैं तो विरोध करने की आपकी क्षमता स्वयमेय कम हो जाती है और उस समय आप सिर्फ अच्छा महसूस करना चाहते हैं। एक मरीज के रूप में आपके पास खिलाफत करने का विकल्प न के बराबर होता है।
यहां पर ध्यान रहे कि सर्जरी की विविध शाखाओं व संज्ञाहरण विज्ञान यानी एनेस्थिजियोलॉजी में हुई दिनों-दिन प्रगति के परिणामस्वरूप आज कोई भी किसी प्रकार का भी ऑपरेशन करवाना सामान्य बात हो गई है। कुशल व अनुभवी सर्जन के सधे हुए हाथों में न सिर्फ आज ऑपरेशन अधिक सुरक्षित हो गए हैं बल्कि नई उन्नत तकनीकों से यह प्रयास भी लगातार किया जा रहा है कि ऑपरेशन के समय कम से काट-छांट करने की नौबत आए ताकि मरीज जल्द से जल्द ठीक होकर अपने घर लौट सके। इसके बावजूद भी अगर चिकित्सकीय भूलें होती रहती हैं तो इसे अपने आप में बहुत बड़े मजाक व विसंगति के अलाव और क्या कहा जाए?

पूरी दुनिया जानती है कि रेफरल बिजनेस वास्तव में मेडिकल प्रैक्टिशनरों के गिरोह के बीच लूटपाट चलाने का एक जरिया है क्योंकि ज्यादातर तो एक-दूसरे के मरीज को उड़ाने के चक्कर में रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि हरेक प्रैक्टिशनर्स में फालतू, बिना मतलब के व काफी मंहगे अनगिनत टेस्ट करवाने की होड़ लगी रहती है। हरेक टेस्ट काफी मंहगे होते हैं और कभी-कभार तो उनका उपयोग उपचार में होता ही नहीं पर इसमें चक्कर कमीशन का रहता है। लेकिन इन सबसे बीमारी के निदान की किसी भी प्रकार की गारंटी नहीं होती। और मेडिकल एस्टेब्लिशमेंट की ओर से इस बारे में हकीकतन कोई जवाबदेही भी नहीं तय की गई है। पीडि़त यदि चाहे तो अदालत की शरण ले सकता है पर कौन इस समय खाऊ झंझट में पडऩा चाहता है? सब अपना हाथ साफ रखना चाहते हैं।

इन हालातों में मानवीय भूलों के जोखिम को न्यूनतम करने के लिए कम से कम कुछ तो कदम उठाने ही होंगे। इसमें पहला व सबसे बड़ा कदम स्व जागरूकता है। यानी हम जागरूक बनें व हम सावधान रहें ताकि ऐसे हालातों को टाला जा सके। जानकारों का कहना है दुनिया भर में जितने मरीजों की इलाज के इौरान मृत्यु होती है या कि उपचार के दौरान उनकी हालत बिगड़ जाती है अथवा वे अपंग हो जाते हैं। उसमें सबसे बड़ा कारण उपचार कर रहे डॉक्टरों की गलतियां भी हैं यानी कि पेशेंट की अर्ली डेथ, पैरालिसिस अटैक या इंजरी के अग्रणी कारणों में से एक चिकित्सकीय गलतियां भी हैं। गलत डाइगनोसिस से उपचार में देरी होगी जिससे कि मरीज के ठीक होने की बात कौन कहे अर्ली डेथ भी संभव है। अर्थात मरीज अस्पताल तो इसलिए गया था कि वह वहां से सेहतमंद होकर सकुशल अपने घर लौट आए .. पर ऐसा नहीं हुआ। घर लौटी उसकी लाश। डॉक्टरों की भूल या लापरवाही से उसे अपनी जान असमय गंवानी पड़ गई। यानी विशेषज्ञ ने जहां बीमारी का गलत संकेत पकड़ा वहां बीमार इंसान को तकलीफें बढ़ जाती हैं। अब यह एकदम मानी हुई बात है कि जो चिकित्सकीय गलतियंा होती हैं उन्हें रोका जा सकता है, ऐसी गलतियों को टाला जा सकता है बशर्ते मरीज अपने स्तर पर जागरूकता दिखाए। वह सावधानी दिखाए। दरअसल, यदि मरीज जागरूक नहीं है और वह गैर अंतर्भूत व गैर-सूचित है तो इस बात की ज्यादा संंभावना है कि वह डॉक्टर की उपचार प्रणाली को स्वीकार कर ले पर जागरूक मरीज के ऐसा करने की कम संभावना है। मरीज को यह हक भी है कि वह डॉक्टर से उपचार या ऑपरेशन के बारे में खुल कर व ज्यादा से ज्यादा सवाल पूंछे। यह उसका नैतिक अधिकार है। इसका पालन करने से आप चिकित्सकीय गल्तियों के शिकार होने से अपने को बचा सकते हैं और एक यही रास्ता है यानी स्व जागरूकता ही एकमात्र जरिया है जिसके माध्यम से आप, हालांकि सब डॉक्टर ऐसे नहीं होते, पर जो होते हैं उनकी पहचान करना सरल भी नहीं हैं, लिहाजा सावधान रहकर आप लालची व लापरवाह डॉक्टरों पर लगाम लगा सकते हैं।
इस विचार के अंत में मैं एक बार फिर अपने पुत्र अभिनव की प्रतिबद्धता को सलाम करता हूं और मेरी शुभकामनाएं हैं कि उसकी इच्छा जल्दी से जल्दी पूरी हो।

सोमवार, 8 अगस्त 2011

नंबर एक चीन: कहीं डर की तो बात नहीं



राजेश विक्रांत

चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है और अभी पिछले ही दिनों अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष-आईएमएफ ने तमाम संभावनाओं का समर्थन करते हुए अपनी ओर से भी इस बात की पुष्टि कर दी है। आईएमएफ के मुताबिक चीन जल्दी ही अमेरिका को पिछाड़ कर दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा। चीन जिस तर से आगे बढ़ रहा है उसके चलते पिछले कई सालों से दुनिया के तमाम अर्थशास्त्री तो इस विषय में एक मत भी हैं। हालांकि अगर आज के माहौल में बात करें तो चीन का पर कैपिटा सकल घरेलू उत्पाद-जीडीपी सबसे बड़ी संभावित अर्थव्यववस्था संबंधी मानकों पर खरा नहीं उतरता। यानी कि आज की तारीख में चीन की पर कैपिटा जीडीपी संतोषजनक स्तर पर नहीं है। पर चीन की जीडीपी रफ्तार के चलते आज की दुनिया का सोचना व उसका रूझान एकदम साफ है। जीडीपी के लिहाज से ज्यादा संभावना तो इसी दशक की है, नहीं तो अगले दशक तक चीन जरूर नंबर एक होकर अमेरिका को दूसरे स्थान पर ढकेल देगा।
इस संभावित उपलब्धि पर चीनी काफी खुश हैं। उनमें दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के प्रति काफी उत्साह है और वे अब प्रसन्नता के खुमार में यह भी सोचने लगे हैं या यूं कहा जाए तो बेहतर होगा कि वे कुछ इसी तरह के सपने भी देखने लगे हैं कि दुनिया के हर हिस्सों के के राष्ट्रीय व अतंरराष्ट्रीय मामलों में अब उनका असर बढ़ जाएगा। हर जगह उनकी बात को वजन मिलेगा। वे जैसा चाहेंगे शेष विश्व पर अपनी राय थोपेंगे। यह बात ठीक उसी तरह है जैसे आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका अपनी टांग हर जगह फंसाता फिरता है, दुनिया के हर कोने में दुनिया की नंबर एक अर्थव्यवस्था की गर्मी की वजह सेअमेरिका दादागिरी करने के लिए हर समय आतुर रहता है। उधर शेष विश्व भी इसी तरह सोच रहा है। उसका संदेह यह है कि चीनी कहीं आगे चल कर दादागिरी न करना शुरू कर दें। पर इस बारे में अंतरराष्ट्रीय पॉलिसी की समझ रखने वाले जानकारों का कहना है कि इस बारें में चीन के संदर्भ में चिंता नहीं करनी चाहिए। रैंकिंग में नंबर एक होने से अपने आप ताकत व प्रभाव तो नहीं आ जाता है। इसके लिए और भी कारकों की दरकार होती है। दरअसल यह उस देश की सोच व मानसिकता पर निर्भर है कि वह अपनी ताकत को अच्छे या बुरे के लिए कैसे इस्तेमाल करता है? पर फिलहाल इस बारे मे कई प्रकार के तर्क दिए जा रहे हैं। लेकिन क्या सचमुच में अमेरिका या शेष दुनिया के लिए चीन का दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना वाकई में खतरे की घंटी है?

जानकारों का कहना है कि बिलकुल नहीं। किसी को डरने या घबराने की जरूरत नहीं हैं। वैसे यह भी आश्चर्यजनक है कि चीन ने काफी तेजी से प्रगति की है। १९४९ में जब चीन कम्यूनिस्ट पार्टी सत्ता में आई तो चीन एक सदी से ज्यादा के पतन व खराब हालातों के चलते बहुत गरीब देश था, तीस साल बाद भी वह राजनीतिक उतार-चढ़ाव की वजह से गरीब देश था। पर चीनी नेताओं ने केंद्रीय योजना, आंतरिक निवेश द्वारा एक्सपोर्ट आधारित वृद्धि व स्थनीय पहल के जरिए नया इतिहास रचा और दूरदर्शिता पूर्ण नीतियों की वजह से चीन के हालात बदलने लगे। सुपरिणाम लाखों-करोड़ों चीनियों का जीवन स्तर सुधरा व आज देश का चेहरा बदल गया है। वह उद्योग-व्यापार कारोबार व उत्पादन में आज दुनिया में बहुत अच्छी हैसियत रखता है। दरअसल चीनी अपने गौरव व अपनी गरिमा में भरपूर भरोसा करते हैं लिहाजा उनका गौरव वापस लौटा है और वे इन दिनों दुनिया की महान ताकतों में से एक के रूप में हमारे सामने हैं। हालांकि उनकी ताकत उस अमेरिका के नुकसान पर है जिसके साथ चीन ने पिछले ६० सालों से कठिन रिश्ता रखा है। वैसे कु छ चीनियों को भरोसा है कि मील का पत्थर पार कर लेने के बाद वे स्वयमेव अंतरराष्ट्रीय ताकत बन जाएंगे व उनके पास अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव आ जाएगा। अन्य देश भी उनके महत्व को स्वीकार करेगे व आने वाले दिनों में ऐसा भी हो सकता है कि बीजिंग यह दबाव डालने लगे कि आईएमएफ या विश्व बैंक का प्रमुख चीनी ही हो।

इन दिनों अंतरराष्ट्रीय गलियारों में इस प्रकार की चर्चा हो रही है कि सर्वाधिक जीडीपी वाला चीन या एक नई ताकत अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को नए दबाव में रख सकता है। आर्थिक ताकत सैन्य ताकत व राजनीतिक प्रभाव में बदल भी सकती है, पर जर्मनी बनाम ग्रेट ब्रिटेन के मामले से संबंधित इतिहास बताता है कि इस बारे में ज्यादा उथल-पुथल की संभावना नहीं है। पहले विश्व युद्ध के एक साल पहले १९१३ में अमेरिका ५०० बिलियन डॉलर के साथ दुनिया में सबसे ज्यादा जीडीपी वाला देश था। तब जर्मनी की २२५ बिलियन डॉलर, ग्रेट ब्रिटेन की २४० बिलियन डॉलर, जबकि रूस, चीन व फ्रांस की ११४ बिलियन डॉलर व जापान की जीडीपी सिर्फ ७१ बिलियन डॉलर थी। पहली बात इससे यह जाहिर होती है सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब बड़ी अंतरराष्ट्रीय ताकत नहीं होता। उस समय अमेरिका की आवाज की कोई कीमत नहीं थी। दूसरी बात सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब बड़ी सैनिक ताकत भी नहीं, १९१३ में अमेरिका के पास अपेक्षाकृत कम सैन्य ताकत थी जबकि जर्मनी व जापान के पास आर्थिक ताकत की तुलना में ज्यादा सैन्य शक्ति थी। बहरहाल आज एक सदी पहले के मापदंड नहीं चलेंगे। तीसरी बात नंबर एक अर्थव्यवस्था का मतलब अंतरराष्ट्रीय तनाव में वृद्धि भी नहीं है। चौथी बात यह कि जब तनाव पैदा होता है वह किसी उभरती ताकत के चलते नहीं होता। १९१४ में जर्मनी ने विश्व युद्ध में कूदने का फैसला एलायंस के दबाव की वजह से लिया था। इसी तरह से ब्रिटेन व रूस के साथ भी हुआ।

यानी कि आर्थिक रैंकिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण बात ताकत होती है। जब आपके अंदर आत्मविश्वास रहेगा तभी आप कुछ कर पाएंगे। अन्यथा आप शून्य हैं। दुनिया में फिर कोई भी देश आपकी आवाज, बात या निवेदन नहीं सुनेगा। क्योंकि उगते सूरज को सभी सलाम करते हैं जबकि डूबते सूरज को कोई नहीं पूछता। चीन की आंतरिक ताकतों पर एक विशेषज्ञ के रूप में जॉन एल थार्टंन चाइना सेंटर के निदेशक केनेथ लिर्बथल कहते हैं कि चीन अपनी आंतरिक ताकत को अच्छी तरह से जानता है। वह बिना सोचे-समझे कोई कदम नहीं उठाएगा इसकी बजाय वह अन्य प्रमुख ताकतों के साथ मिल कर काम करेगा क्योंकि इस बात को चीन बहुत अच्छी तरह से जानता भी है कि उसकी ताकत तो दूसरे देशों के सहयोग से आई है व अभी भी आ रही है। जब दूसरे देश उसे सहयोग करना या समर्थन देना बंद कर देंगे तो उसकी ताकत कोई कीमत नहीं रह जाएगी। लिहाजा चीन अतंरराष्ट्रीय प्रणालियों व मामलों पर थोड़ा दबाव तो बना सकता है पर इससे ज्यादा कुछ होने की संभावना नहीं दिखती है। वैसे अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा का प्रशासन भी कुछ इसी तरह की बात सोचता है।

अगर चीन नंबर एक बन जाता है तो अमेरिका के पास भी कई प्रकार की च्वॉइस हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय लीडरशिप से तब उसे थोड़ा समय मिलेगा और नंबर २ के रूप में वह कुछ और भी महत्वपूर्ण काम कर सकता है। यह काम उसके आंतरिक फायदे के लिए होंगे। वह सरकारी वित्त, शिक्षा, विज्ञान व तकनीक सरीखे राष्ट्रीय महत्व के उन कई मुद्दों पर अपना फोकस कर सकता है जो अब तक थोड़ा उपेक्षित भी रहे हैं। फिर चिंता की क्या बात? हम आप आखिर क्यों डरें? भय का आखिर क्या कारण हा? आजकल के हालात बता रहे हैं कि चीन विवाद की बजाय सहकारिता का संकेत दे रहा है। यानी अगर इन दिनों चीन दुनिया की नंबर एक अर्थव्वस्था बनने के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है तो यह कोई कारण न हुआ कि अमेरिकी पहाड़ों की ओर चले जाएं। कुल मिला कर चीन के नंबर एक होने से किसी को भी डरने की कोई जरूरत नहीं है।